हिंदी व्याकरण

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दो वर्णों ( स्वर या व्यंजन ) के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं . संधि में कहीं एक अक्षर और कहीं दो अक्षरों में परिवर्तन होता है और वहां दोनों अक्षरों के स्थान पर नया तीसरा अक्षर  नए रूप में आ जाता है . इसी को संधि कहते हैं . संधि किये गये शब्दों को अलग अलग करके पूर्व की तरह करना ही संधि विच्छेद कहलाता है |

जैसे

  • विद्या + आलय = विद्यालय ( यह संधि है )
  • धनादेश = धन + आदेश ( यह संधि विच्छेद है )
  • भानु + उदय = भानूदय
  • हिम + आलय = हिमालय
  • राजा + इंद्र = राजेन्द्र
  • महा + ऋषि = महर्षि
  • लोक + उक्ति = लोकोक्ति

जैसा कि हम जानते है कि दो वर्णों के मेल को संधि कहते है ऊपर के उदाहरण से स्पष्ट है ‘ विद्यार्थी ‘ संधि है | विद्यार्थी को ‘विद्या’ + ‘अर्थी’ अलग –अलग कर देने की प्रक्रिया ही संधि विच्छेद कही जाती है | अत: विद्या + अर्थी संधि विच्छेद है |

धि शब्द का शाब्दिक अर्थ है – जोड़ अथवा मेल |’संधि’ शब्द का अर्थ व्यापक अर्थों में लिया जाता है ,परंतु यहाँ संधि शब्द का अर्थ वर्णों के मेल और विच्छेद से होता है | दो वर्णों का जो मेल या जोड़ होता है वह नियमों के अधीन होता है | संधि के नियम बने हुए है | जिसके अधीन संधि की जाती है |संधि में भाषा के नियमों का पूर्ण रूप से पालन किया जाता है | हिंदी भाषा में तत्सम शब्दों की बहुलता है | अत: संस्कृत के नियमों का पालन किया जाता है |

संधि के भेद (Kinds of Sandhi)

संधि तीन प्रकार की होती है

  • १. स्वर संधि  
  • २. व्यंजन संधि
  • ३. विसर्ग संधि

संधि प्रकरण को आरम्भ करते समय हमें निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए –
१. स्वर दो प्रकार के होते है –
१. हस्व , २ . दीर्घ .

उदहारण – अ , आ हस्व स्वर हैं . ई , ए, ऐ,औ दीर्घ स्वर हैं .
२. अ , आ , हस्व व दीर्घ स्वर होते हुए भी समान स्वर हैं . इसी प्रकार ई , इ भी समान स्वर हैं .
३. बिना स्वर की सहायता के व्यंजन का उच्चारण नहीं हो सकता . व्यंजन के साथ स्वर छिपा रहता है . यथा ; क + अ = क .

स्वर संधि (vowel sandhi)

स्वर के साथ स्वर के मेल को स्वर संधि कहते हैं . दों स्वरों के मेल से जो संधि होती है ,उसे स्वर संधि कहते है |

जैसे:

  • विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
  • सूर्य + उदय = सूर्योदय
  • मुनि + इंद्र = मुनीन्द्र
  • कवि + ईश्वर = कवीश्वर
  • महा + ईश = महेश

स्वर संधि के भेद ( Kinds of Vowel Sandhi )

स्वर संधि के पाँच भेद हैं:

  • १. दीर्घ संधि
  • २. गुण संधि
  • ३. वृद्धि संधि
  • ४. यर्ण संधि
  • ५. अयादी संधि

1. दीर्घ संधि [ सूत्र – अक: सवर्णे दीर्घ: ]

जब प्रथम शब्द के अंत में हृस्व या दीर्घ स्वर तथा द्वितीय शब्द के प्रारम्भ में हृस्व या दीर्घ स्वर हो तथा दोनों में स्वर समान हो तो दोनों के स्थान पर दीर्घ स्वर हो जाता है |इसे दीर्घ संधि कहते है |

इसको इस रूप में भी समझ सकते है कि यदि प्रथम शब्द के अंत में अ,इ,उ,ऋ हृस्व अथवा दीर्घ तथा द्वितीय शब्द के प्रारम्भ में उसी वर्ण का हृस्व अथवा दीर्घ स्वर हो तो दोनों के स्थान पर दीर्घ आ, ई, ऊ, ॠ हो जाता है |

उदाहरण: पुस्तक +आलय = पुस्तकालय ( अ+आ=आ )

इसकों इस प्रकार समझ सकते है:

  • अ , आ + अ , आ = आ
  • इ , ई + इ , ई = ई
  • उ , ऊ + उ , ऊ = ऊ
  • ऋ , ॠ + ऋ , ॠ = ॠ

दीर्घ संधि के उदाहरण

  • पुस्तक + अर्थी = पुस्तकार्थी
  • राम +अवतार = रामावतार
  • सत्य + अर्थी = सत्यार्थी
  • सूर्य +अस्त = सूर्यास्त
  • देह + अन्त = देहान्त
  • वेद +अन्त = वेदान्त
  • कल्प + अन्त = कल्पान्त
  • उत्तम+ अंग = उत्तमांग
  • दैत्य +अरि = दैत्यारि
  • शरण +अर्थी = शरणार्थी
  • राम + अयण = रामायण
  • अन्न +अभाव = अन्नाभाव
  • पुष्प + अवली = पुष्पावली
  • शरण + अर्थी = शरणार्थी
  • धन + अर्थी = धनार्थी
  • चरण +अमृत = चरणामृत
  • स्वर्ण + अवसर = स्वर्णावसर
  • शब्द + अर्थ = शब्दार्थ
  • अद्य + अवधि = अद्यावधि
  • धर्म+ अर्थी = धरमार्थी
  • महा + आलय = महालय
  • हिम + आलय = हिमालय
  • देव + आलय = देवालय
  • भोजन + आलय = भोजनालय
  • परम + आत्मा = परमात्मा
  • परम + आवश्यक = परमावश्यक
  • रत्न + आकर = रत्नाकर
  • कुश + आसन = कुशासन
  • धर्म + आत्मा = धर्मात्मा
  • राम + आधार = रामाधार
  • नित्य+ आनंद = नित्यानंद
  • महा ‌+ आत्मा = महात्मा
  • परम + आनंद = परमानंद
  • कमल + आसन = कमलासन
  • आज्ञा + अनुपालन = आज्ञानुपालन
  • राम + आश्रय = रामाश्रय
  • वार्ता + आलाप = वार्तालाप
  • शिक्षा +अर्थी = शिक्षार्थी
  • परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी
  • शिव + आलय = शिवालय
  • गिरि + इंद्र = गिरीन्द्र
  • अभि + इष्ट = अभीष्ट
  • गिरि + ईश = गिरीश
  • कवि + इंद्र = कवींद्र
  • रवि + इंद्र = रवींद्र
  • नदी + ईश = नदीश
  • रजनी + ईश = रजनीश
  • मही + ईश = महीश
  • परि + ईक्षा = परीक्षा
  • वारि + ईश = वारीश
  • लक्ष्मी + इच्छा = लक्ष्मीच्छा
  • अधि + ईश्वर = अधीश्वर
  • भारती + ईश्वर = भारतीश्वर
  • मुनि + ईश्वर = मुनीश्वर
  • पृथ्वी + ईश = पृथ्वीश
  • जानकी + ईश = जानकीश
  • प्रति + इति = प्रतीति
  • देवी + इच्छा = देवीच्छा
  • महती + इच्छा = महतीच्छा
  • सू + उक्ति = सूक्ति
  • भानु + उदय = भानूदय
  • मंजु + ऊषा = मंजूषा
  • लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
  • विधु + उदय = विधूदय
  • साधु + उपदेश = साधूपदेश
  • स्वयंभू + उदय = स्वयंभूदय
  • कटु + उक्ति = कटूक्ति
  • भू + ऊष्मा = भूष्मा
  • रघु + उत्तम = रघूत्तम
  • लघु + ऊक्ति = लघूक्ति
  • वधू + उल्लास = वधूल्लास
  • भू + उत्तम = भूत्तम
  • भू + उपरि = भूपरि
  • मातृ + ऋणम = मातृणम
  • मातृ + तृण = मातृण
  • पितृ + ऋण = पितृण
  • होतृ + ऋकार = होतृकार

2. गुण संधि [ सूत्र – आद्गुण: ]

यदि अ या आ के बाद हृस्व या दीर्घ इ या ई आवें तो दोनो के स्थान पर ‘ए’ हो जाता है | उ या ऊ आवे तो दोनों के स्थान पर ओ तथा ऋ या ॠ आवे तो दोनों के स्थान पर अर् और लृ आवे तो दोनो के स्थान पर अल् आदेश हो जाता है | इस नियम से बने संधि को गुण संधि कहते है |

इसे इस प्रकार भी समझ सकते है:

  • अ या आ + इ या ई = ए
  • अ या आ + उ या ऊ = ओ
  • अ या आ + ऋ या ॠ = अर्
  • अ या आ + लृ      = अल्

गुण संधि के उदाहरण –

  • सुर + इंद्र = सुरेंद्र
  • उप + इंद्र = उपेंद्र
  • नर + इंद्र = नरेंद्र
  • शुभ + इच्छु = शुभेच्छु
  • पूर्ण + इंद्र = पुर्णेंद्र
  •  प्र + इत = प्रेत
  • महा + इंद्र = महेंद्र
  • स्व +इच्छा = स्वेच्छा
  • सुर + ईश = सुरेश
  • रमा + ईश = रमेश
  • देव + ईश = देवेश
  • महा + ईश्वर = महेश्वर
  • परम + ईश्वर = परमेश्वर
  • दिन + ईश = दिनेश
  • राका + ईश = राकेश
  • महा + ईश = महेश
  • खग + ईश = खगेश
  • नर + ईश = नरेश
  • सर्व + ईश्वर = सर्वेश्वर
  • सूर्य + उदय = सूर्योदय
  • चन्द्र + उदय = चंद्रोदय
  • जल + ऊर्मि = जलोर्मि
  • नर + उत्तम = नरोत्तम
  • पर + उपकार = परोपकार
  • वेद + उक्त = वेदोक्त
  • महा + उपदेश = महोपदेश
  • महा + ऊर्मि = महोर्मि
  • महा + ऊर्जस्वी = महोर्जस्वी
  • गंगा+ ऊर्मि = गंगोर्मि
  • महा + ऊर्जा = महोर्जा
  • ब्रह्म+ ऋषि = ब्रह्मर्षि
  • महा + ऋषि = महर्षि
  • देव + ऋषि = देवर्षि
  • राज + ऋषि = राजर्षि
  • सप्त + ऋषि = सप्तर्षि
  • महा + ऋण = महर्ण
  • तव +लृकार = तवल्कार

3. वृद्धि संधि – [ सूत्र – वृद्धिरेचि ]

यदि अ या आ के बाद ए या ऐ आवे तो दोनों के स्थान पर ‘ ऐ ‘ हो जाता है तथा अ या आ के बाद ओ या औ आवें तो दोनों के स्थान पर ‘ औ ‘ आदेश हो जाता है | इस नियम प्रक्रिया को वृद्धि संधि कहते है |

इसे इस प्रकार समझाया जा सकता है:

  • अ या आ + ए या ऐ = ऐ
  • अ या आ + ओ या औ = औ

अपवाद:

नियम: यदि प्र उपसर्ग के साथ ऊढ़/ऊढि/ऊह शब्दों का मेल हो रहा हो तो वहाँ गुण संधि नहीं होकर वृद्धि संधि होती है जैसे:

  • प्र + ऊढ़ – प्रौढ़
  • प्र + ऊह – प्रौह
  • प्र + उढ़वान – प्रोढवान

नियम 2: यदि अक्ष शब्द के साथ ऊहिनी शब्द का मेल हो रहा हो तो वहाँ पर गुण संधि नहीं होकर वृद्धि संधि होती है जैसे –

  • अक्ष + ऊहिनी – अक्षोहिणी (Sandhi In Hindi)

नियम 3: यदि स्व शब्द के साथ ईर/ईरी/ईरिणी शब्दों का मेल हो रहा हो तो वहाँ पर भी गुण संधि न होकर वृद्धि संधि होती है जैसे –

  • स्व + ईर – स्वैर
  • स्व + ईरी – स्वैरी
  • स्व + ईरिणी – स्वैरिणी

वृद्धि संधि के उदाहरण:

  • एक + एक = एकैक
  • दिन + एक = दिनैक
  • अद्य + एव = अद्यैव
  • देव +ऐश्वर्य = देवैश्वर्य
  • तत्र + एव = तत्रैव
  • मत + ऐक्य = मतैक्य
  • नव + ऐश्वर्य = नवैश्वर्य
  • कृष्ण + एकत्व = कृष्णैकत्व
  • सदा + एव = सदैव
  • न + एवम = नैवम
  • सर्वदा +एव = सर्वदैव
  • तथा + एव = तथैव
  • महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
  • एकदा + एव = एकदैव
  • वन + ओषधि = वनौषधि
  • परम + ओज = परमौज
  • जल + ओध = जलौध
  • उष्ण + ओदन = उष्णौदन
  • जल + ओस = जलौस
  • महा + ओषधि = महौषधि
  • परम + औदार्य = परमौदार्य
  • महा + औदार्य = महौदार्य
  • महा + ओज = महौज

4. यण संधि [ सूत्र- इको यणचि ]

यदि हृस्व या दीर्घ इ ,उ ,ऋ ,लृ के बाद कोई भी असमान स्वर आये तो उसके स्थान पर क्रमश: य् ,व् ,र ,ल् हो जाता है |

अपवाद: यदि किसी शब्द में ‘स्व’ शब्दांश प्राप्त हो रहा हो एवं उसका अर्थ अपना/अपनी/अपने ग्रहण किया जा रहा हो तो वहाँ संधि-विच्छेद करते समय ‘स्व’ शब्दांश ‘+’ से पहले लिखा जाता है जैसे

इसे इस प्रकार समझा जा सकता है:

  • इ या ई + कोई असमान स्वर = य्
  • उ या ऊ + कोई असमान स्वर = व्
  • ऋ या ॠ + कोई असमान स्वर = र्
  • लृ     + कोई असमान स्वर = ल्

यण संधि के उदाहरण

  • यदि + अपि = यद्यपि
  • अति + अल्प = अत्यल्प
  • उपरि+ उक्त = उपर्युक्त
  • प्रति + एक = प्रत्येक
  • अति + उक्ति = अत्युक्ति
  • अति + आनंद = अत्यानंद
  • नि + ऊन = न्यून
  • अधि + अयन = अध्ययन
  • अति + आचार = अत्याचार
  • प्रति+ उपकार = प्रत्युपकार
  • अति + उत्तम = अत्युत्तम
  • रीति + अनुसार = रीत्यनुसार
  • अति + उर्ध्व = अत्यूर्ध्व
  • दधि + ओदन = दध्योदन
  • अति + आवश्यक = अत्यावश्यक
  • प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर
  • अति + औचित्य = अत्यौचित्य
  • अति + उक्ति = अत्युक्ति
  • अति + योज = अत्योज
  • नदी + आमुख = नद्यामुख
  • नदी + उद्गम = नद्युद्गम
  • सखी + एक्य = सख्यैक्य
  • वाणी + औचित्य = वाण्यौचित्य
  • देवी +आलय = देव्यालय
  • देवी+ उक्ति = देव्युक्ति
  • देवी ‌+ आगमन = देव्यागमन
  • देवी + ओज = देव्योज
  • सु + आगत = स्वागत
  • सु + अल्प = स्वल्प
  • मनु + अंतर = मन्वंतर
  • मधु + आलय = मध्वालय
  • अनु + आदेश = अन्वादेश
  • अनु + ईक्षण = अन्वीक्षण
  • वधू + आगमन = वध्वागमन
  • वधू + ऐश्वर्य = वध्वैश्वर्य
  • पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा
  • मातृ + आज्ञा = मात्रज्ञा
  • पितृ + इच्छा = पित्रिच्छा
  • लृ + आकृति = लाकृति

5. अयादि संधि [ सूत्र – एचोsयवायाव: ]

यदि ए ,ऐ ,ओ, औ, के बाद कोई असमान स्वर आवे तो ए, ऐ, ओ, औ के स्थान पर क्रम से अय् ,आय् , अव् , आव् हो जाता है |

जैसे: ने + अन = नयन

इसको इस प्रकार समझा जा सकता है:

  • ए + कोई असमान स्वर = अय्
  • ऐ + कोई असमान स्वर =आय्
  • ओ + कोई असमान स्वर = अव्
  • औ + कोई असमान स्वर = आव्

अपवाद

नियम 1: यदि ‘गो’ शब्द के साथ इन्द्र/अक्षि(अक्ष)/अग्र शब्द का मेल हो रहा हो तो ‘ओ’ को अव् में नहीं बदलकर ‘अव’ में बदला जाता है

जैसे:
गो + इन्द्र – ग् + अव + इन्द्र – गवेन्द्र (अयादि/गुण)
गो + अग्र – ग् + अव + अग्र – गवाग्र (अयादि/दीर्घ)

नियम 2: यदि ओ/औ स्वर के साथ य प्रत्यय अथवा युति शब्द का मेल हो रहा हो तो वहाँ पर भी अयादि संधि मानी जाती है एवं इनमें संधि करने पर ओ/औ के स्थान पर अव्/आव् आदेश किया जाता है

जैसे:
गो + य – ग् + अव् + य – गव्य
गो + यूति – ग् + अव् + यूति – गव्यूति (दो कोस की दूरी)

अयादि संधि के उदाहरण

  • ने + अन = नयन
  • चे + अन = चयन
  • शे + अन = शयन
  • गै + अक = गायक
  • नै + अक = नायक
  • गै + अन = गायन
  • सै + अक = सायक
  • भो + अन = भवन
  • गो + ईश = गवीश
  • पो ‌+ अन = पवन
  • रो + ईश = रवीश
  • पो + इत्र = पवित्र
  • गो + अन = गवन
  • पौ + अक = पावक
  • पौ + अन = पावन
  • नौ + इक = नाविक

व्यंजन संधि

(Combination of Consonants) 

जब संधि करते समय व्यंजन के साथ स्वर या कोई व्यंजन के मिलने से जो रूप में परिवर्तन होता है, उसे ही व्यंजन संधि कहते हैं।

यानी जब दो वर्णों में संधि होती है तो उनमे से पहला यदि व्यंजन होता है और दूसरा स्वर या व्यंजन होता है तो उसे हम व्यंजन संधि कहते हैं।

जैसे:

  • दिक् + अंत = दिगंत
  • सत् + जन = सज्जन
  • उत् + ज्वल = उज्ज्वल
  • सत् + आनंद = सदानंद
  • उत् + गम = उद्गम
  • परि + छेद = परिच्छेद
  • आ + छादन = आच्छादन
  • वि + छेद = विच्छेद
  • दिक् + अम्बर = दिगम्बर
  • अभी + सेक = अभिषेक
  • दिक् + गज = दिग्गज
  • जगत + ईश = जगदीश

» इस संधि में मुख्यतः निम्न तीन स्थितियां प्राप्त हो सकती है –

व्यंजन + स्वर – व्यंजन संधि
स्वर + व्यंजन – व्यंजन संधि
व्यंजन + व्यंजन – व्यंजन संधि

व्यंजन संधि के नियम :

व्यंजन संधि के कुछ नियम होते हैं जो कि निम्न है :

नियम 1: जब किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मिलन किसी वर्ग के तीसरे या चौथे वर्ण से या (य्, र्, ल्, व्, ह) से या किसी स्वर से हो जाये तो क् को ग् , च् को ज् , ट् को ड् , त् को द् , और प् को ब् में बदल दिया जाता है।

अगर व्यंजन से स्वर मिलता है तो जो स्वर की मात्रा होगी वो हलन्त वर्ण में लग जाएगी।

लेकिन अगर व्यंजन का मिलन होता है तो वे हलन्त ही रहेंगे।

उदाहरण:

  • क् का ग् में परिवर्तन :
  • वाक् +ईश : वागीश
  • दिक् + अम्बर : दिगम्बर
  • दिक् + गज : दिग्गज
  • ट् का ड् में परिवर्तन :
  • षट् + आनन : षडानन
  • षट् + यन्त्र : षड्यन्त्र
  • षड्दर्शन : षट् + दर्शन
  • त् का द् में परिवर्तन :
  • सत् + आशय : सदाशय
  • तत् + अनन्तर : तदनन्तर
  • उत् + घाटन : उद्घाटन
  • प् का ब् में परिवर्तन :
  • अप् + ज : अब्ज
  • अप् + द : अब्द आदि।

नियम 2: अगर किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मिलन न या म वर्ण ( ङ,ञ ज, ण, न, म) के साथ हो तो क् का ङ्, च् का ज्, ट् का ण्, त् का न्, तथा प् का म् में परिवर्तन हो जाता है।

उदाहरण :

  • क् का ङ् में परिवर्तन :
  • दिक् + मण्डल : दिङ्मण्डल
  • वाक् + मय : वाङ्मय
  • प्राक् + मुख : प्राङ्मुख
  • ट् का ण् में परिवर्तन :
  • षट् + मूर्ति : षण्मूर्ति
  • षट् + मुख : षण्मुख
  • षट् + मास : षण्मास
  • त् का न् में परिवर्तन :
  • उत् + मूलन : उन्मूलन
  • उत् + नति : उन्नति
  • जगत् + नाथ : जगन्नाथ

नियम 3: जब त् का मिलन ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, व से या किसी स्वर से हो तो द् बन जाता है।

म के साथ क से म तक के किसी भी वर्ण के मिलन पर ‘ म ‘ की जगह पर मिलन वाले वर्ण का अंतिम नासिक वर्ण बन जायेगा।

उदाहरण :

म् का (क ख ग घ ङ) के साथ मिलन :

सम् + कल्प : संकल्प/सटड्ढन्ल्प

  • सम् + ख्या : संख्या
  • सम् + गम : संगम
  • शम् + कर : शंकर

म् का (च, छ, ज, झ, ञ) के साथ मिलन :

  • सम् + जीवन : संजीवन
  • सम् + चय : संचय
  • किम् + चित् : किंचित

म् का (ट, ठ, ड, ढ, ण) के साथ मिलन :

  • दम् + ड : दंड
  • खम् + ड : खंड

म् का (त, थ, द, ध, न) के साथ मिलन :

  • सम् + देह : सन्देह
  • सम् + तोष : सन्तोष/
  • किम् + नर : किन्नर

म् का (प, फ, ब, भ, म) के साथ मिलन :

  • सम् + पूर्ण : सम्पूर्ण
  • सम् + भव : सम्भव

त् का (ग , घ , ध , द , ब , भ ,य , र , व्) के उदहारण :

  • जगत् + ईश : जगदीश
  • भगवत् + भक्ति : भगवद्भक्ति
  • तत् + रूप : तद्रूपत
  • सत् + भावना = सद्भावना

नियम 4 : त् से परे च् या छ् होने पर च, ज् या झ् होने पर ज्, ट् या ठ् होने पर ट्, ड् या ढ् होने पर ड् और ल होने पर ल् बन जाता है।

म् के साथ (य, र, ल, व, श, ष, स, ह) में से किसी भी वर्ण का मिलन होने पर ‘म्’ की जगह पर अनुस्वार ही लगता है।

उदाहरण :

  • सम् + वत् : संवत्
  • तत् + टीका : तट्टीका
  • उत् + डयन : उड्डयन
  • सम् + शय : संशय

नियम 5: जब त् का मिलन अगर श् से हो तो त् को च् और श् को छ् में बदल दिया जाता है। जब त् या द् के साथ च या छ का मिलन होता है तो त् या द् की जगह पर च् बन जाता है।

उदाहरण:

  • उत् + शिष्ट : उच्छिष्ट
  • शरत् + चन्द्र : शरच्चन्द्र
  • उत् + छिन्न : उच्छिन्न
  • उत् + चारण : उच्चारण

नियम 6 : जब त् का मिलन ह् से हो तो त् को द् और ह् को ध् में बदल दिया जाता है। त् या द् के साथ ज या झ का मिलन होता है तब त् या द् की जगह पर ज् बन जाता है।

उदाहरण :

  • उत् + हरण : उद्धरण
  • तत् + हित : तद्धित
  • सत् + जन : सज्जन
  • जगत् + जीवन : जगज्जीवन
  • वृहत् + झंकार : वृहज्झंकार
  • उत् + हार : उद्धार

नियम 7: स्वर के बाद अगर छ् वर्ण आ जाए तो छ् से पहले च् वर्ण बढ़ा दिया जाता है।

त् या द् के साथ ट या ठ का मिलन होने पर त् या द् की जगह पर ट् बन जाता है।

जब त् या द् के साथ ‘ड’ या ढ की मिलन होने पर त् या द् की जगह पर‘ड्’बन जाता है।

उदाहरण:

  • आ + छादन : आच्छादन
  • संधि + छेद : संधिच्छेद
  • तत् + टीका : तट्टीका
  • वृहत् + टीका : वृहट्टीका
  • भवत् + डमरू : भवड्डमरू
  • स्व + छंद : स्वच्छंद

नियम 8: अगर म् के बाद क् से लेकर म् तक कोई व्यंजन हो तो म् अनुस्वार में बदल जाता है।

त् या द् के साथ जब ल का मिलन होता है तब त् या द् की जगह पर ‘ल्’ बन जाता है।

उदाहरण :

  • तत् + लीन = तल्लीन
  • विद्युत् + लेखा = विद्युल्लेखा
  • किम् + चित = किंचित
  • उत् + लास = उल्लास

नियम 9: म के बाद य, र, ल, व, श, ष, स, ह में से कोई एक व्यंजन हो तो म् अनुस्वार में बदल जाता है।

उदाहरण:

  • सम् + योग : संयोग
  • सम् + हार : संहार
  • सम् + वाद : संवाद
  • सम् + शय : संशय

नियम 10 : ऋ, रू या थ्रू के बाद न तथा इनके बीच में चाहे स्वर, क वर्ग, प वर्ग , अनुश्वार , य व या ह आये तो न् का ण हो जाता है।

उदाहरण :

  • भुष + अन : भूषण
  • प्र + मान : प्रमाण
  • राम + अयन : रामायण

नियम 11 : यदि किसी शब्द का पहला वर्ण स हो तथा उसके पहले अ या आ के अलावा कोई दूसरा स्वर आये तो स के स्थान पर ष हो जाता है।

उदाहरण:

  • अनु + सरण : अनुसरण
  • सु + सुप्ति : सुषुप्ति
  • वि + सर्ग : विसर्ग
  • नि : सिद्ध : निषिद्ध

नियम 12 : यौगिक शब्दों के अंत में यदि प्रथम शब्द का अंतिम वर्ण न हो, तो उसका लोप हो जाता है।

उदाहरण :

  • हस्तिन + दंत : हस्तिन्दंत
  • प्राणिन + मात्र : प्राणिमात्र
  • राजन + आज्ञा : राजाज्ञा

नियम 13 : जब ष के बाद त या थ रहे तो त के बदले ट और थ के बदले ठ हो जाता है।

उदाहरण:

  • शिष् + त : शिष्ट
  • पृष् + थ : पृष्ठ

विसर्ग संधि

(Combination Of Visarga)

जब संधि करते समय विसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन वर्ण के आने से जो विकार उत्पन्न होता है, हम उसे विसर्ग संधि कहते हैं।

जैसे:

  • निः + रोग = निरोग
  • निः + संकोच = निस्संकोच
  • नमः + कार = नमस्कार
  • निः + तार = निस्तार
  • मनः + ताप = मनस्ताप
  • दुः + कर्म = दुष्कर्म
  • आवि : + कार = आविष्कार
  • अंतः + करण : अन्तकरण
  • अंतः + गत : अंतर्गत
  • अंतः + ध्यान : अंतर्ध्यान
  • अंतः + राष्ट्रीय : अंतर्राष्ट्रीय

विसर्ग संधि के नियम:

नियम 1: अगर कभी शब्द में विसर्ग के बाद च या छ हो तो विसर्ग श हो जाता है। ट या ठ हो तो ष तथा त् या थ हो तो स् हो जाता है। जैसे:

उदाहरण:

  • नि: + चल : निश्चल
  • धनु: + टकार : धनुष्टकार
  • नि: + तार : निस्तार

नियम 2: अगर कभी संधि के समय विसर्ग के बाद श, ष या स आये तो विसर्ग अपने मूल रूप में बना रहता है या उसके स्थान पर बाद का वर्ण हो जाता है।

उदाहरण : 

  • नि: + संदेह : निस्संदेह
  • दू: + शासन : दुशासन

नियम 3: अगर संधि के समय विसर्ग के बाद क, ख या प, फ हों तो विसर्ग में कोई विकार नहीं होता।

उदाहरण: 

  • रज: + कण : रज:कण
  • पय: + पान : पय:पान

नियम 4: अगर संधि के समय विसर्ग से पहले ‘अ’ हो और बाद में घोष व्यंजन या ह हो तो विसर्ग ओ में बदल जाता है।

उदाहरण:

  • मनः + भाव : मनोभाव
  • यशः + दा : यशोदा

नियम 5: अगर संधि के समय विसर्ग से पहले अ या आ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तथा बाद में कोई घोष वर्ण हो तो विसर्ग के स्थान र आ जाता है। जैसे: 

उदाहरण:

  • निः + गुण : निर्गुण
  • दु: + उपयोग : दुरूपयोग

नियम 6: अगर संधि के समय विसर्ग के बाद त, श या स हो तो विसर्ग के बदले श या स् हो जाता है। जैसे: 

उदाहरण:

  • निः + संतान : निस्संतान
  • निः + तेज़ : निस्तेज
  • दु: + शाशन : दुश्शाशन

नियम 7: अगर संधि करते समय विसर्ग से पहले अ या आ हो तथा उसके बाद कोई विभिन्न स्वर हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है एवं पास-पास आये हुए स्वरों की संधि नहीं होती। जैसे:

उदाहरण: अतः + एव : अतएव

नियम 8: अंत्य के बदले भी विसर्ग होता है। यदि के आगे अघोष वर्ण आवे तो विसर्ग का कोई विकार नहीं होता और यदि उनके आगे घोष वर्ण आ जाता है तो र ज्यों का त्यों रहता है। जैसे: 

उदाहरण:

  • पुनर् + उक्ति : पुनरुक्ति
  • अंतर् + करण : अंतःकरण

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