हिंदी व्याकरण

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खड़ी बोली का अर्थ – आजकल जिसे हिंदी कहा  है ,वह खड़ी बोली का विकसित रूप है। खड़ी बोली का यह नाम क्यों पड़ा ,इस विषय में मतभेद हैं।

मुख्यतया तीन मत हैं:

  • १. यह खरी बोली हैं। खरी बोली से बिगड़कर इसका नाम खड़ी बोली पड़ गया।
  • २. ब्रजभाषा की तुलना में कर्कश होने के कारण इसे खड़ी बोली कहा जाने लगा।  
  • ३. मेरठ के आस पास की पड़ी बोली को खड़ी बनाकर लश्करों में प्रयोग किया गया, इसीलिए इसे खड़ी बोली कहा गया।

यद्यपि इसके वर्तमान मानक स्वरुप का विकास उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ है, परन्तु इसका आरंभिक रूप दसवीं शताब्दी में ही दिखाई देने लगा था. १४ वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अमीर खुसरों ने खड़ी बोली में पहेलियाँ रचकर साहित्य लेखन का भी श्रीगणेश कर दिया था। १४वीं शताब्दी में सबसे  अमीर खुसरो ने खड़ी बोली का प्रयोग करना आरंभ किया और उसमें बहुत कुछ कविता की, जो सरल तथा सरस होने के कारण शीघ्र ही प्रचलित हो गई। अतः अमीर खुसरो खड़ी बोली के जन्मदाता माने जाते हैं।  

खड़ी बोली कहाँ बोली जाती है ?

उत्तर भारत की इस खड़ी बोली को मुसलमान शासक दक्षिण भारत में ले गए।  उन्होंने इसे अरबी -फ़ारसी में लिखा तथा दक्खिनी हिंदी- उर्दू नाम दिया। उत्तर भारत में यह बोली केवल बोलचाल तक सीमित रही।  मध्यकाल तक ब्रज, मैथिली और अवधी भाषाएँ साहित्य में छायी रहीं और फ़ारसी राजदरबार में जड़ें जमाये रहीं। परिणामस्वरूप कड़ी बोली व्यापक जनभाषा होते हुए भी उपेक्षित सी रही।

हिंदी के विकास के कारण

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में ऐसे कारण उत्पन्न होने लगे जिसके कारण खड़ी बोली का विकास मार्ग स्वयं प्रशस्त हो गया।  यह जन -संपर्क की शसक्त भाषा तो थी ही ,ज्ञान विज्ञान को समेटने में भी इसे आगे आना पड़ा.ज्ञान विज्ञान के लिए गद्य भाषा की आवश्यकया थी, जबकि ब्रज, मैथिली और अवधी काव्य भाषाएँ थी। अतः ज्ञान का वाहन बनाने के लिए स्वाभाविक रूप से इसे चुना गया।उन्ही दिनों भारत में छापेखाने का आगमन हुआ, अंग्रेजी गद्य साहित्य का प्रसार हुआ, राजनितिक चेतना का उदय हुआ, पत्र पत्रिकाओं का उदभव और प्रसार हुआ, लोकतंतत्रामक भावनाओं का जन्म हुआ, जान जागरण का वातावरण बना, शिक्षा का उन्नत  विकास हुआ।परिणामस्वरूप खड़ी बोली देश में व्याप्त हो गयी।  यह राष्ट्रीय एकता का भी पर्याय बन गयी।

खड़ी बोली आन्दोलन

हिंदी को लोकप्रिय बनाने में जहाँ भारतेन्दु ,मैथिलीशरण गुप्त ,प्रेमचंद आदि साहित्यकारों ने महत्वपूर्ण योगदान दियता ,वहां महावीर प्रसाद द्विवेदी ,रामचंद्र शुक्ल जैसे विद्वानों ने उसे व्याकरण शुद्ध मानक रूप दिया। सौभाग्य से स्वामी विवेकानंद ,दयानद ,तिलक ,गाँधी ,सुभाष आदि महापुरषों ने भी हिंदी के माध्यम से स्वदेश जागरण किया। स्वतंत्र आंदोलन के दिनों में हिंदी ही राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधने में अग्रणी रही।  अतः यही कारण १९४९ई।  में संविधान में इसे राजभाषा का गौरवशाली सम्मान प्रदान किया गया।

हिंदी प्रान्त HINDI PROVINCE –

भारत में निन्मलिखित प्रान्त हिंदी भाषा -भाषी प्रान्त है
उत्तर प्रदेश, बिहार, रजसजतन, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, दिल्ली और उत्तराखंड। इसके अतिरिक्त निन्मलिखित प्रांतों में हिंदी संपर्क भाषा है – पंजाम, महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल।  इसके अलावा हिंदी पुरे भारत में समझी और बोली जाती है।हिंदी भाषा यद्यपि खड़ी बोली से विकसित ही है ,किन्तु उस पर ब्रज ,अवधी आदि अनेक बोलियों का व्यापक प्रभाव रहा है। धायण देने योग्य बात यह है कि ब्रज, अवधी, मैथिली, गढ़वाली, भोजपुरी आदि बोलियों का साहित्य भी हिंदी की ही धरोहर है। यही कारण है कि सूर, तुलसी, विद्यापति आदि हिंदी के कवि कहलाते हैं।

हिंदी की उपभाषा –

हिंदी की पांच उपभाषाएँ हैं –१. पच्शिमी हिंदी२. पूर्वी हिंदी३. राजस्थानी४. बिहारी५. पहाड़ी।

हिंदी की कितनी बोलियां हैं ?

इन उपभाषाओँ की अनेक बोलियां आती है जो निम्न प्रकार है –
१. पच्शिमी हिंदी – ब्रज ,खड़ी बोली ,बांगरू ,बुंदेली ,कन्नौजी।
२. पूर्वी हिंदी – अवधी ,बघेली ,छत्तीसगढ़ी।
३. राजस्थानी – मेवाती ,मारवाड़ी ,मेवाड़ी।
४. बिहारी – भोजपुरी ,मगही ,मैथली।
५. पहाड़ी – हिमाचली ,गढ़वाली ,कुमाउँनी।

हिंदी राष्ट्रभाषा कब बनी ?

भारत की संविधान सभा ने १४ सितम्बर ,१९४९ को भारत संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। संविधान  के अनुच्छेद ३४३ के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है।

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